| जनेऊ संस्कार का वैज्ञानिक महत्व | |||||||||||
| हम ऐसी कई परंपराओं से बंधे हुए हैं, धर्म हमें जिनका पालन करना सिखाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं | |||||||||||
| कि इन परंपराओं का सिर्फ धार्मिक लिहाज से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक लिहाज से भी बेहद महत्व है। इस्लाम | |||||||||||
| में नमाज अता करना, वजू करना, हिंदू धर्म में सूर्य नमस्कार, तुलसी को जल देना, भोजन से पहले भोग | |||||||||||
| लगाना, इन सभी परंपराओं का वैज्ञानिक पक्ष इनके धार्मिक पक्ष से अधिक बलवान है... | |||||||||||
| जनेऊ धारण करना इन्हीं परंपराओं में से एक है। जनेऊ धागों वाला एक सूत्र होता है। इसे 'उपनयन संस्कार' | |||||||||||
| (यज्ञोपवीत संस्कार) के समय धारण कराया जाता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में 'यज्ञोपवीत' कहा जाता है। | |||||||||||
| यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे बाएं कंधे के ऊपर से दाईं भुजा के नीचे तक पहना जाता है। यह | |||||||||||
| केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है। | |||||||||||
| साधारण भाषा में जनेऊ एक ऐसी परंपरा है, जिसके बाद ही एक बच्चे को मर्द का स्थान दिया जाता है और | |||||||||||
| वह पारंपरिक तौर से पूजा आदि में भाग ले सकता है। प्राचीन काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को | |||||||||||
| शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलता था। | |||||||||||
| पूजा पाठ भारतीय परंपरा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है और भारतीय समाज के अनुसार एक बच्चा तैरह साल | |||||||||||
| का होने के पश्चात, तब तक किसी भी यज्ञ में आहुति नहीं दे सकता, जब तक उसने जनेऊ धारण ना किया हो | |||||||||||
| ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में 'यज्ञोपवीत संस्कार' यानी जनेऊ की परंपरा है। | |||||||||||
| वैज्ञानिक रूप से जनेऊ धारण करने के कई लाभ हैं। धार्मिक रूप से नित्यक्रम से पूर्व जनेऊ को कानों पर कस | |||||||||||
| कर दो बार लपेटना अनिवार्य है लेकिन ऐसा करने के पूछे वैज्ञानिक हित भी हैं। ऐसा करने से कान के पीछे की | |||||||||||
| दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल | |||||||||||
| विसर्जन आसानी से हो जाता है। | |||||||||||
| कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक | |||||||||||
| देती है, जिससे कब्ज, ऐसिडिटी, पेट से संबंधित रोग, ब्लड प्रेशर, हार्ट के डिजीज सहित अन्य इन्फेक्शन नहीं | |||||||||||
| होते। | |||||||||||
| जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह नित्यक्रम के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। | |||||||||||
| जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से | |||||||||||
| उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट के रोगों सहित जीवाणुओं से से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा | |||||||||||
| लाभ हार्ट पेशंट को होता है। | |||||||||||
| शरीर के पृष्ठ भाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है, जो विद्युत के प्रवाह की तरह कार्य करती है | |||||||||||
| यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है। यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप | |||||||||||
| लाजवंती वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकुचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों | |||||||||||
| की सीमा नहीं लांघ पाता। | |||||||||||
| कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है। यदि उसकी | |||||||||||
| प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है। सारनाथ | |||||||||||
| की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई | |||||||||||
| देती है। | |||||||||||
| यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है। अतः इसे सदैव धारण करना हितकारी | |||||||||||
| होता है। शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, | |||||||||||
| वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श | |||||||||||
| करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। | |||||||||||
Thursday, 1 May 2014
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