Saturday, 3 May 2014

बैद्यनाथ धाम, बाबा धाम और कई अन्य नामों से जाना जाने वाला झारखंड जिला का शहर देवघर पवित्र हिंदू तीर्थो में से एक है। इसे देवगढ़ भी कहा जाता है। आप देवघर आएंगे तो बैद्यनाथ यात्रा से ही जान जाएंगे कि भारतीय हिंदू के लिए आध्यात्मिकता क्या अर्थ रखती है। यहां तीर्थयात्रियों का तांता लगा रहता है। यह शहर हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल है। यहां भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर स्थित है। हर सावन में यहां लाखों शिव भक्तों की भीड़ उमड़ती है जो देश के विभिन्न हिस्सों सहित विदेशों से भी यहां आते हैं। इन भक्तों को कावरियां कहा जाता है। ये शिव भक्त बिहार में सुल्तानगंज से गंगा नदी से गंगाजल लेकर 105 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर देवघर में भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं। देवघर शांति और भाईचारे का प्रतीक है। यह एक प्रसिद्ध हेल्थ रिजॉर्ट है, लेकिन इसकी पहचान हिंदु तीर्थस्थान के रूप में की जाती है। यहां बाबा बैद्यनाथ का ऐतिहासिक मंदिर है जो भारत के बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है। देवघर सती के 52 शक्तिपीठों में से भी एक है। पुराणों में देवघर को हृदय पीठ और चिता भूमि भी कहा गया है क्योंकि इसी स्थान पर माता पार्वती का हृदय गिरा था और और यहीं भगवन शिव ने उनका अंतिमसंस्कार किया था।
पर्यटन स्थल:-
बैद्यनाथ मंदिर
बैद्यनाथ मंदिर में स्थापित लिंग भगवान शिव के बारह च्योतिर्लिगों में से एक है। भगवान श्री बैद्यनाथ च्योतिर्लिग का मंदिर जिस स्थान पर अवस्थित है उसे बैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह च्योर्तिलिंग लंकापति रावण द्वारा लाया गया था। बैधनाथ को आत्मलिंग, महेश्वर्लिंग, कमानालिंग, रावणेश्वर महादेव, श्री वैधनाथलिंग, नर्ग तत्पुरुष और बेंगुनाथ के आठ नामों से जाना जाता है। बैद्यनाथ धाम में यूं तो सालों भर लोग च्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन सावन व अश्रि्वन मास में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ पहुंचती है। बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मंदिर भी हैं
बासुकीनाथ मंदिर
बासुकीनाथ अपने शिव मंदिर के लिए जाना जाता है। बैद्यनाथ मंदिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक बासुकीनाथ में दर्शन नहीं किए जाते हैं। यह मंदिर देवघर से 45.20 किलोमीटर दूर स्थित हिन्दुओं का यह तीर्थ स्थल दुमका जिले में स्थित है।
बैजू मंदिर
बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर के पश्चिम में देवघर के मुख्य बाजार में तीन और मंदिर भी हैं। इन्हें बैजू मंदिर के नाम से जाना जाता है।
त्रिकुट पहाड़ियां
देवघर से 16 किलोमीटर दूर दुमका रोड पर एक ख़ूबसूरत पर्वत त्रिकूट स्थित है। इस पहाड़ पर बहुत सारी गुफाएं और झरनें हैं। यह स्थल मयूराक्षी नदी के स्रोत के लिए प्रसिद्ध है।
नौलखा मंदिर
देवघर के बाहरी हिस्से में स्थित यह मंदिर अपने वास्तुशिल्प की ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण बालानंद ब्रह्मचारी के एक अनुयायी ने किया था।
नंदन पहाड़
शांत और प्राकृतिक वातावरण एक खूबसूरत मंदिर की उपस्थिति के कारण और भी जीवंत हो उठता है। नंदन पहाड़ देवघर के छोर पर स्थित है। इस पर्वत की महत्ता यहां बने मंदिरों के झुंड के कारण है। जो विभिन्न भगवानों को समर्पित हैं। यहां बच्चों के बड़ा पार्क भी है।
सत्संग आश्रम
देवघर के दक्षिण पश्चिम में स्थित सत्संग आश्रम झारखंड के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। इसकी स्थापना ठाकुर अनुकूलचंद्र द्वारा की गई थी। यह बहुत ही सौम्य और शांत वातावरण में स्थित है। सर्व धर्म मंदिर के अलावा यहां पर एक संग्रहालय और चिड़ियाघर भी है।
तपोवन
देवघर से 10 किमी दूरी पर स्थित तपोवन अपने प्रसिद्ध शिवमंदिर के लिए जाना जाता है। गुफाओं और पहाड़ी पर बने मंदिरों के लिए जाना जाने वाला तपोवन एक रमणीय स्थान है। मान्यता है कि यह ऋषि बाल्मीकी तपस्या करने आए थे। कहते हैं कि श्री बालानंद बह्माचारी ने यहां पर तप करके दिव्यता प्राप्त की।
पहुंचने का माध्यम
वायुमार्ग-पटना निकटतम हवाईअड्डा है और भारत के सभी प्रमुख स्थानों से उड़ानों द्वारा जुड़ा है।
रेलमार्ग-निकटतम रेलवे स्टेशन बैद्यनाथ धाम है। जसीडीह जंक्शन भारत के सभी प्रमुख भागों से जुड़ा है।
सड़कमार्ग-देवघर भारत के प्रमुख शहरों से सड़कमार्ग द्वारा जुड़ा है।

Thursday, 1 May 2014





जनेऊ संस्कार का वैज्ञानिक महत्व


हम ऐसी कई परंपराओं से बंधे हुए हैं, धर्म हमें जिनका पालन करना सिखाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं 
कि इन परंपराओं का सिर्फ धार्मिक लिहाज से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक लिहाज से भी बेहद महत्व है। इस्लाम
में नमाज अता करना, वजू करना, हिंदू धर्म में सूर्य नमस्कार, तुलसी को जल देना, भोजन से पहले भोग 
लगाना, इन सभी परंपराओं का वैज्ञानिक पक्ष इनके धार्मिक पक्ष से अधिक बलवान है...
जनेऊ धारण करना इन्हीं परंपराओं में से एक है। जनेऊ धागों वाला एक सूत्र होता है। इसे 'उपनयन संस्कार' 
(यज्ञोपवीत संस्कार) के समय धारण कराया जाता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में 'यज्ञोपवीत' कहा जाता है। 
यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे बाएं कंधे के ऊपर से दाईं भुजा के नीचे तक पहना जाता है। यह 
केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है।
साधारण भाषा में जनेऊ एक ऐसी परंपरा है, जिसके बाद ही एक बच्चे को मर्द का स्थान दिया जाता है और 
वह पारंपरिक तौर से पूजा आदि में भाग ले सकता है। प्राचीन काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को 
शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलता था।
पूजा पाठ भारतीय परंपरा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है और भारतीय समाज के अनुसार एक बच्चा तैरह साल 
का होने के पश्चात, तब तक किसी भी यज्ञ में आहुति नहीं दे सकता, जब तक उसने जनेऊ धारण ना किया हो
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में 'यज्ञोपवीत संस्कार' यानी जनेऊ की परंपरा है।
वैज्ञानिक रूप से जनेऊ धारण करने के कई लाभ हैं। धार्मिक रूप से नित्यक्रम से पूर्व जनेऊ को कानों पर कस 
कर दो बार लपेटना अनिवार्य है लेकिन ऐसा करने के पूछे वैज्ञानिक हित भी हैं। ऐसा करने से कान के पीछे की
दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल
विसर्जन आसानी से हो जाता है।
कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक
देती है, जिससे कब्ज, ऐसिडिटी, पेट से संबंधित रोग, ब्लड प्रेशर, हार्ट के डिजीज सहित अन्य इन्फेक्शन नहीं
होते।
जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह नित्यक्रम के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। 
जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से 
उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट के रोगों सहित जीवाणुओं से से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा
लाभ हार्ट पेशंट को होता है।
शरीर के पृष्ठ भाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है, जो विद्युत के प्रवाह की तरह कार्य करती है
यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है। यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप
लाजवंती वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकुचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों
की सीमा नहीं लांघ पाता।
कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है। यदि उसकी
प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है। सारनाथ 
की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई
देती है।
यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है। अतः इसे सदैव धारण करना हितकारी
होता है। शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म,
वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श
करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है।